Sunday, September 4, 2011

तूफान

फसिं हैं डाल पे, 
जूलज़ रहीं हैं तूफान से,
नीचे गांस की लपटे,
करतीं हैं इंतज़ार उसका |

ओन्स की बूंदो की तरह, 
जो लहराके, फिसलती हैं,
आँखों की किसी पीची की तरह, 
आनेवाले तूफान का पहला फरमान सुनाती हैं |

देखते ही देखते, रेंगते ही रेंगते,
सारे बंधन तोड़के, टूट पड़ी हैं बूंदे,
उस ओन्स को ढूँढने |

थक के, हार के,
इमली छोड़ चुकी पेड़ का हाथ,
पर उसीकी छाओं में काटती,
वोह अपनी आखरी रात |

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