Saturday, August 20, 2011

अन्धेरा

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शिषे में उतारों तो शराब हूँ मैं,
सिरहाना लादो तो टंडी नींद हूँ मैं,
पिगलती आखें बह जाएं तो अन्धेरा  हूँ मैं |



Saturday, August 6, 2011

सुखें पत्ते

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सुखें पतों के किनारे,
गीली बेंच पर अपने पुष्ट टिकाये,
बेहकती हुई गाँस पे मैंने, 
खयाली पुलाव पकाए |

हवा मेरे बालों को बेहलाये,
रझाई नहीं तो का? हम धूप में छुप जाए,
चटाई पे टेक, हाथ में कोई किताब अग्रेज,
पैर पे पैर डालें हम ज़िन्दगी का लुफ्त उठायें |